जला दई गढ़ लंका

जला दई  गढ़ लंका

(तर्ज – इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा….)

एक बन्दर ने-2 जला दई गढ़ लंका, अंजनी का लाला। टेर।।

हमरी ना मानो तो भगतों से पूछो,

राम का दास कहाया लंगोटे वाला।।

जला दई….।।1।।

हमारी ना मानो तो विभीषण से पूछो,

कुटिया में पाया विश्राम बण के मतवाला।

जला दई….।।2।।

हमारी ना मानो तो सीता से पूछो,

मूदड़ी का दिया प्रमाण कर रूप निराला।

जला दई….।।3।।

हमारी ना मानो तो राक्षसों से पूछो,

मारा अक्षय कुमारा, बणके विकराला।।

जला दई….।।4।।

हमारी ना मानो तो लक्ष्मण से पूछो,

उसके प्राण उबारे, पा पूंटी का प्याला।।

जला दई….।।5।।

हमारी ना मानो तो रावण से पूछो,

उनकी रात कटाई, कर मौत का गाला।।

जला दई….।।6।।

हमरी ना मानो तो ‘चन्दाणी’ से पूछो,

फूलचन्द पाया उठे  ज्ञान,  हिरदै उजियाला।।

जला दई….।।7।।