सीता-हरण

सीताहरण

(तर्ज-हरियाणा)

काम जरूरी सुग्रीव राजा विपदा भारी आई।

दसकंधर सीता को लेग्या पता लगादे भाई।। टेर।।

भाता विरह

(तर्ज-छुप गये चाँद सितारे होय क्या बात हो गयी…)

बजरंगी न आये होय क्या बात हो गयी।

चिन्ता बड़ी गात में आधी रात हो गई।। टेर।।

बजरंग बाला, काम कुढ़ाला होया उजाला, आया ना।

लक्ष्मण वीर के होई पीड़, भरे नीर आँसू सुखाया ना।।

द्राणाचल रस्ते में क्या खुराफात हो गई।।

चिन्ता बढ़ी…..।।1।।

सेना पास क्यू खावे त्रास, सब भये उदास बलकारी।

भाई खास, क पड़ी ल्हाश, ना रही आस, एक बारी।।

भीड़ पड़े में दोहरी भवानी मात हो गई।।

चिन्ता बढ़ी…..।।2।।

रामचन्द्र करें घणां रुदन, जब देख बदन भाई का।

भाग फूटग्या, साथ छूटग्या, पहाड़ टूटग्या विपदाई का।।

बीती जावे रात, टैस प्रभात हो गई।

चिन्ता बढ़ी…..।।3।।

नहीं त्रुटि, ल्यावें बूंटी, पावे घूंटी प्याला।

फूलचन्द कहै बणा छन्द, अन्ध दूर मिटावे बाला।।

होया होश झट फूलों की बरसात हो गई।

चिन्ता बढ़ी…..।।4।।