मन्दिर का उद्गम

Photo1आज से लगभग ३१० वर्ष पूर्व ठाकुर बनवारीदास जी नौरंगसर (चुरु) मे रहते थे। उनके पुत्र तुलछीरामजी के चार पुत्र थे।जिसमें सालमसिंह सबसे बडे थे। ये चारों भाइ चार स्थानों में अलग अलग रेहते थे, जिनके नाम क्रमशः नौरंगसर, तिडोकी, जुलियासर तथा सालमसर है। ठाकुर सालमसिंह के उक्त स्थान पर निवास करने पर “तैतरवालों की ढाणी” को ही “सालमसर” नाम से जाना जाने लगा और कालन्तर मे सालमसर का नाम ही सालासर है। इसी ग्राम मे पन्डित सुखरामजी निवास करते थे।इनके पुर्वज रेवासा ठाकुर के यहाँ धान कूँतने (अँकन) करने का काम करते थे।और इसी के साथ ही पौराहिक कार्य भी सम्पन्न कराते थे। इनका विवाह सीकर के रूल्यणी गाँव के रहने वाले पं.लच्छिरामजी पाटोदिया की आत्मजा कान्ही देवी के साथ सम्पन्न हुआ। कुछ ही वर्षों में अच्छा सम्मान, धन एवं पुत्ररत्न की प्राप्ति हुइ।ये परिवार सहित सुख पूर्वक जीवन यापन कर रहे थे।ठाकुर सालमसिंह जब यहाँ आये तो उनकी पं.सुखरामजी से आत्मीयता हो गयी।किन्तु भाग्य की विडम्बना पं.सुखरामजी का पुत्र जब शिशु काल मे था, तब पन्डित का स्वर्गवास हो गया। उस वक्त उनका प्राण प्यारा पुत्र मात्र ५ वर्ष का था। रूल्यणी गाँव से पं.लच्छिरामजी के छहों पुत्र सालासर आ पहुँचे और अपनी शोकाकुल बहन को सान्त्वना दी।इस के पश्चात कान्हि अपने अबोध पुत्र को लेकर भाइयों सहित माइके चली ग​ई। पं. लच्छिरामजी के छोटे छह पुत्र मोहनदास बाल्यकाल से ही श्री हनुमत भक्त थे।जैसा पं. स्वरूपनारायणजी द्वारा सं॰२०२४ में रचित लावणी की इन पन्क्तियों द्वारा स्पष्ट है –

दधीच द्विज सूंटवाला सालासर में थे सुखरामजी।
पाटोदया लछिरामजी की लडकी थी कान्ही नाम जी॥
षट पुत्र पुत्री सांतवीं जन्मी रूल्याणी गाँव जी ।
छोटा ही छोटा पुत्र मोहनदास था गुणधाम जी ॥

पं. लच्छिरामजी के सबसे छोटे पुत्र मोहनदास के नामकरण के समय ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की आगे चलकर यह बालक एक तेजस्वी संत पुरुष बनेगा, जिसका यष दुनिया में चहूंदिश विस्त्रित होगा।बचपन से ही उनकी गम्भीर मुख मुद्रा को देख कर ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे वह भगवान केध्यान मे मग्न हैं।ऐसा पुर्व जन्म के पुण्य प्रताप से ही सम्भव है।कालान्तर मे पं. लच्छिरामजी के देहान्त के पश्चात मोहनदास अपना अधिकान्ष समय ईश्वर के शरण में व्यतीत करने लगे। साथ ही उन्हें परिवार एवं संसार से विरक्ति उत्पन्न होने लगी। सामूहिक परिवार मे अधिक समय तक साथ न रहने का विचार कर कान्हि बाइ ने सालासर मे आने का सन्कल्प किया। मोहन ने अपने भाइयों से पूछा कि बहन के ये सन्कटपूर्ण दिन किस प्रकार व्यतीत होंगे? उन्हे तो सहारे की आवश्यक्ता है।हम भाइयों में से किसी एक को भानजे उदय के बडे होने तक वहाँ कृषि कार्य मे सहयोग करना चाहिये। 

सुन भाइय्याँ उत्तर दियो , म्हांक टाबरी साथ जी।
रह्यां सरे नहीं एक पल, सुनो हुमारे भ्रात जी॥
दुख मेटन भगनी का मोहन,सालसर में रहा सुजान।
निज भक्त जान के विप्र मोहन की,भक्ति लखि उरम्यान ॥

किन्तु पाँचों भाइयों ने उत्तर दिया कि हम तो बाल बच्चे वाले हैं और बहन का अन्न नहीं ग्रहण कर सकते,इसलिये वहाँ रहने में हम सब असमर्थ हैं।भाइयों के द्वारा यह सुन कर मोहनदास जी का मन उदास हो गया कि सगे भाइ भी विपत्ति मे साथ छोड देते हैं। तब उन्होनें मन में दृढ संकल्प किया कि मैं स्वयं बहन के पास रहूँगा और बोले-बहन, मैं आजीवन तेरे साथ रहूँगा । इन भाइयों को यहीं रहने दो। तुम अपने मन में कोइ दुःख ना लाओ।मैं तुम्हारे साथ हूँ। 

मोहनदासजी की कर्म भूमि : भक्ति

Photo2

इस प्रकार समझाकर मोहनदासजी अपने जन्म स्थान रूल्याणी से विदा होकर बहन के साथ ही सालसर मेंरेहने लगे।इसी के साथ ईश्वर की भक्ति भी करते रहे।कुछ ही वर्षौं के परिश्रम से मोहनदासजी ने अपनी बहन के खेतों को सोना उगलने वाले उपजाऊ बना दिये। कुछ समय पश्चात पं॰सुखरामजी के भाइ जो तीडियासर मे महन्त थे, उनके सहयोग से नागौर के ग्राम रताउ निवासी कीएक ब्राह्मण सुशीला पुत्री के साथ अपने भानजे उदय का विवाह कर दिया। सर्वगुण सम्पन्न नव वधू घर आ ग​ई।कान्ही बाइ के घर मंगलाचार होने लगे और इसी के साथ उन के घर मे लक्षमी का आगमन होने लगा।कान्ही बाइ के घर भूखों को भोजन, प्यासे को पानी, राही को ठिकाना और विश्राम मिलने लगा।कोइ भिक्षुक खाली हाथ नहीं लौटता था। याचकगणों का आशीर्वाद भी उन्हें प्राप्त होता था, क्योंकि परोपकार से किए गए दान का फ़ल दिन दुना रात चौगुना होत है।

 मोहनदासजी पर हनुमनत कृपा

बालक मोहनदास जी को भक्ति की प्रेरणा उनके पूज्य पिता पंडित लच्छीरामजी से बाल्यावस्था में ही मिल चुकी थी, परन्तु स्वयं हनुमान जी द्वारा मोहनदास जी को भक्ति की प्रेरणा का प्राप्त होना एक आलौकिक प्रसंग है। 

उस वक़्त आये मोहन को कहे,महावीर स्वामी आप जी।
गंडासी खोश बगाय जी,मत कर रे पापी पाप जी॥
रैन दिन हरि को भजो,और जपो अजपा जाप जी।
सब माफ़ औगुण गुण हरे, त्रय ताप तन कर साफ़ जी।

Photo3श्रावण मास में एक दिन उदयरामजी खेत में हल चला रहे थे और मोहनदासजी बंजर भूमि को कृषि के योग्य बना रहे थे।स्वयं हनुमान जी ने साक्षात प्रकट हो कर उन्हें कृषि के कार्य से विरक्त होने का आदेश दिया और मोहनदासजी के हाथ से गंडासी छीन कर दूर फ़ेंक दी, किन्तु वे उसे पुनः उठाकर सूड़ करने लगे, फ़िर हनुमान जी ने गंडासी छीन कर फ़ेंक दी और ईश्वर का भजन करने का आदेश दिआ।इस प्रकार यह लीला क​ई बार हुई।उदयरामजी दूर खडे ये सब देख रहे थे कि मामाजी बार-बार गंडासी फ़ेंकते हैं और उसे उठा लेते हैं,उन्हें बडा आश्चर्य हुआ।वे हल छोडकर पास में आये और उन के स्वास्थ्य के बारे में पुछा कि आपका चित्त ठीक नहीं है, आप दो घडी आराम कर लीजिये, किंन्तु मोंहनदास जी ने बताया कि कोइ देवता मेरे पीछे पडे हैं,मेरा चित्त ठीक नही है।इस घटना कि चर्चा सांयकाल उन्होंने अपनी माँ से की और कहा मामा का मन काम में नहीं लगता है, अगर हम इन के भरोसे रहे तो इस बार फ़सल नही होगी।कन्ही बाइ के मन मे यह विचार आया कि मोहन का विवाह अभी तक नहीं हुआ है, यदि इन्हें विवाह बन्धन में बान्ध दिआ जाये तो इनका चित्त स्थिर हो जाएगाऔर अगर अपने भाइ का विवाह नहीं किया तो ये सन्यासी हो जा​एगा।फ़िर लोग क्या कहेंगे ऐसा सोच कर बहन अपने भाइ मोहनदास के लिए प्रयास करने लगी।

मोहनदासजी विवाह सूत्र में नहीं बँध पाए

माता कहे बेता हुयो , मामा भी मुटियार जी।
विवाह सगाइ इनका , जल्दी है करने सार जी॥

कान्ही बाइ द्वारा विवाह के सम्बन्ध मे पुछने से हर बार मोहनदासजी मना कर देते थे, लेकिन बहन ने सोचा कि भाई सन्कोच के कारण मना करता है,इसलिए विवाह की तैयारी मे लगी रही। बहुत प्रयास करने के बाद एक लडकी से सगाई तय हुइ।सस्ते भाव मे अनाज की बिक्री कर के सगाई मे देने के लिए सोने के गहने बनवाए अवं नाई को लडकी के घर नेगचार करने को भेजा, किन्तु वहाँ पहुँचने के पुर्व ही उस कन्या की मृत्यु हो गयी। भक्त मोहनदासजी ने उक्त घटना के सम्बन्ध में भविश्यवाणी पूर्व मे ही कर दी थी।अब सबको उन पर आश्चर्य हुआ।इसके पश्चात कान्ही बाई ने उनके विवाह के लिए पुनः नहीं कहा और वे स्वयं भी ईश्वर का भजन करने लगी,उपरोक्त घटना के बाद भक्त मोहनदासजी जीवन पर्यन्त भ्रम्हचर्य का पालन करते हुए मौनव्रत धारण करके कठिन तपोमय जीवन व्यतीत करने लगे। 

हनुमानजी द्वारा साधु बनकर भिक्षा माँगना

कुछ समय पश्चात कान्ही बाई के घर भगवान हनुमानजी साधु का रूप धरकर भिक्षा माँगने आ गये, जिस प्रकार भक्त भगवान के दर्शन को तरसते हैं,ठीक उसी प्रकार से भगवान भी अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। 

एक दिन कान्ही उदय मोहन,यह भोजन भोजन कर रह्या ।
साधु का धर के भेष, आ हनुमान हाका कर गया ॥
आया जी म्हे,आया जी म्हे,दो चार बेरी यूँ कहा।
मोहन कहे तू घाल आटो, बाइ कान्ही तू कर दया॥

Photo4उस समय कान्ही बाई मोहनदास और उदय को भोजन करा रहीं थीं। इस कारण से उन्हें भिक्षा देने मे देर हो गयी।थोडी देर मे कान्ही बाई ने द्वार पर देखा तो वहाँ कोई नहीं था, जब वह वापस अन्दर आयीं तो उन्हें पुनः उसी साधु का ग्यान हुआ,किन्तु देखने पर कोइ दिखाई नहीं पडा।इसके बाद मोहनदासजी ने बताया की ये तो स्वयं बालाजी महाराज थे,जो दर्शन देने आये थे।तब कान्ही बाई ने भाई से आग्रह किया कि भगवान बालाजी के दर्शन हमें भी कराओ।दो माह पश्चात दुबारा श्री हनुमान जी ने आकर द्वार पर नारायण हरी,नारायण हरी का उच्चारण किया।तब कान्ही बाई ने मोहनदासजी को बताया कि कोइ साधु बाहर खडा़ है,इतना सुनकर मोहनदासजी द्वार पर आये और देखा तो श्री बालाजी वापस जा रहे थे,वे उनके पीछे पिछे दौडे़,काफ़ी दूर जाने पर संत वेशधारि बालाजी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उनको डराया धमकाया,लेकिन भक्त अपने भगवान से कहाँ दरते हैं,मोहनदासजी ने हनुमान जी के चरण कमलों को मजबूती से पकड़ लिया।तब हनुमान जी ने उनसे कहा कि तुम मेरे पीछे पिछे मत आओ।मैं तुम्हारी निश्चल भक्ति से प्रसन्न हूँ।तुम जो भी वर माँगोगे मैं तुमको अवश्य दूँगा।मोहनदासजी ने हाथ जोड़कर कहा कि आप मेरी बहन कान्ही बाई के घर अवश्य चलिये। 

हनुमानजी द्वारा भक्त का निमंत्रण स्वीकार​ 

यों बोले हनुमान चले हम, तुमको ये वचन निभाने होंगे।
खीर खाँड सूँ भोजन​, सेज अछूति सोयेंगे॥
मोहनदास मंजूर किया, तब कहा प्रकत यहाँ होवेंगे।
वरदान दिया हम, भजन करने से पाप तेरे सब खोवेंगे॥

Photo5भक्त वत्सल श्री हनुमान जी महाराज ने उत्तर दिया,मैं अवश्य चलूँगा,किन्तु मैं केवल पवित्र स्थान पर ही बैठूँगा और मिश्री सहित खीर व चूरमे का नैवेद्य स्वीकार करूँगा।भक्त शिरोमणि मोहनदासजी द्वारा सभी प्रकार के आश्वासन देने तथ अत्यधिक प्रेम व आग्रह से परम कृपालु श्री बालाजी महाराज उनकी बहन कान्ही बाई के घर पधारे एवं खीर और चूरमा खा कर बडे़ प्रसन्न हुए। भोजन के पश्चात विश्राम करने के लिए पहले से तैयार शैय्या पर विराजमान हुए।भाइ बहन के निश्चल सेव भक्ति से प्रसन्न होकर श्री बालाजी महाराज ने कहा कि कोइ भी मेरी छाया (आवेश) को अपने ऊपर करने की चेष्टा नहीं करेगा। श्रद्धा सहित जो भी भेंट दी जायेगी,मै उसका प्रेम के साथ ग्रहण करूँगा और अपने भक्त की हर मनोकामना पुर्ण करूँगा।ऐसा कहकर श्री बालाजी अन्तर्ध्यान हो गये। तत्पश्चात भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी उस गाँव के बाहर एक बालू के टीले के ऊपर छोटी सी कुटिया बनाकर उसमें निवास करने लगे और श्री हनुमानजी की भक्ति मे मग्न हो गये ।

ईश्वर क सच्चा भक्त ईश्वर-भक्ति मे लीन होने के करण सांसारिक मोह माया में नहीं पड़ता और वह कम से कम ही बोलता है। वह अपने मन में ईश्वर की भक्ति को ही संजोये रखता है, किन्तु सांसारिक गतिविधियों के कारण अनेकों बाधायें आती हैं,फ़िर भी उनकी ईश्वर-भक्ति का तार नहीं टूटता।वे स्वभाव वश एकान्तप्रिय होते हैं,क्योंकी ईश्वर-भक्ति एकान्त मे ही होती है।एकान्तप्रिय होने के कारण और किसी से न बोलने के कारण भी सांसारिक लोग इन्हे पागल समझ बैठते हैं।इसी कारण से भक्त्-शिरोमणी मोहनदासजी को लोग “बावलिया” नाम से पुकारने लगे।वे सभी  सांसारिक झंझटों से बचने के लिए एक निर्जन स्थान मे शमी (जाँटी) वृक्ष के नीचे अपना आसन लगाकर बैठ गये और मौनव्रत का पालन करने लगे।

एक बार की बात है कि इसी शमी वृक्ष के नीचे मोहनदासजी अपनी धूनी रमाकर तपस्या कर रहे थे, वह वृक्ष फ़लों से लद गया था।तभी एक दिन – 

मोहन कहे मत सोचकर, तू सोच से गिर जाएगा।
कह साँच तुझको कौन भेजा,काज सब सर जाएगा॥
माता नटी मेरे बाप भेजा,तुझे कुण चर जाएगा।
जा बाप को कह साग खा,तू आज ही मर जाएगा।

Photo6उस वृक्ष पर एक जाट का पुत्र चुपचाप चढ़कर शमी के फ़ल (सांगरी) तोडने लगा। डर के कारण घबराहट मे कुछ फ़ल मोहनदासजी के उपर गिर पडे,जिससे उनका ध्यान भंग हो गया।उन्होंने सोचा कि कहीं कोइ पक्षी घायल होकर तो नहीं गिरा और उन्होंने अपनी आँखे खोल दीं।जाट  पुत्र भय से काँप उठा।मोहनदासजी ने उसे भय मुक्त कर के नीचे आने को कहा। नीचे आने पर उससे पूछा की तुम यहाँ क्यों आये हो,तुमको किसने भेजा है? उसने बताया कि माँ के मना करने के बाद भीमेरे पिता ने मुझे यहाँ सांगरी ले आने के लिए विवश किया और यह भी कहा कि तुमहे बावलिये से क्या डर​,वह तुझे खा थोडे ही जायेगा? ऐसा सुनकर भक्त प्रवर ने कहा कि जाकर अपने पिता से कह देना, इन सांगरीयों का साग खाने वाला जीवीत नहीं रह सकता।जनश्रुति के अनुसार उस जाट ने मोहनदासजी के मना करने के पश्चात भी वह साग खा लिया और उस की मृत्यु हो गई। इस जाट को साधु के तिरस्कार का दन्ड मिल गया। 

हनुमानजी द्वारा भक्त के साथ बाल क्रीडायें

जनश्रुति के अनुसार आजन्म ब्रह्मचारी भक्त मोहनदासजी के साथ निर्जन स्थान में श्री हनुमानजी महारज स्वयं बाल-क्रीडा़यें करते थे।
गाँव के सब हार बोले,उदोजी के साथ जी।
इस खोज वाला ना मिले,कर जोडे बोले बात जी॥
मामा तुम्हारा जबर है,जबरां सू घाली बाथजी।
इनकी गति ये ही लिखें,ना और की औकात जी॥

photo7एक बार भक्त शिरोमणि के शरीर पर मल्ल-यद्ध के खेल में लगी चोटों को देखकर उनके भानजे उदयराम ने पूछा,तब मोहनदासजी ने अबोध बालकों द्वारा पीटने का बहाना बनाकर उसे टाल दिया,परन्तु उदयराम को इस पर सन्तोश नही हुआ और उन्होंने खोजियों को बुलाकर सारी बात बतायी,उनके पदचिन्हों को देखकर रहस्य का पता लगाने को कहा।जब खोजियों ने पदचिन्हों को देखा तो उन्हें कोइ पदचिन्ह बहुत छोटा और कोइ चिन्ह बहुत बडा मिला। कहीं कहीं पर तो वे पदचिन्ह मिले ही नही।अन्ततः पदचिन्ह अन्वेषक सच्चाइ का पता लगाने मे पूरी तरह असफ़ल हो गये और वे उदयरामजी से हाथ जोडकर बोले कि ये पदचिन्ह किसी मनुष्य के नहीं हैं,बल्कि किसी देवता या राक्षस के हैं।इस घटना के पश्चात बक्त शिरोमणि मोहनदासजी के प्रति लोगों के मन मे आदर​-भाव, सम्मान और आस्था दिनों-दिन बढ़ती ही गयी। 

भक्त मोहनदासजी द्वारा डाकू से रक्षा

सालसर ग्राम भूतपूर्व में बीकानेर राज्य के आधीन था। उस समय ग्रामों के शासन का कार्य ठाकुरों के हाथ मे था।सालसर एवं उसके निकट के अनकों गाँव सौभाग्य देसर (शोभासर) के ठाकुर धीरज सिंघ के देखबाल मे थे। असमय एक कुख्यात डाकू हजारों घुडसवार साथियो के साथअत्याचार करता हुआ सालासर के निकट पहुँचा।शाम होने पर वहीं डेरा डालने का विचार कर के अपने सहयोगी डाकुओं को पास के गाँव से खाने पीने का समान लाने के लिये भेजा और रसद ना देने पर लूट पाट करने की धमकी भी दी।

है एक दिवस की बात , फ़ौज चढ आयी।
सालम सिंघ ठाकुर की अकल चकराई॥
जद मोहनदास सारों से बात सुणाई।
बज्रङ कहे होसी फ़तेह , डरो मत भाई॥

Photo9उससे आतंकित ठाकुर धीरज सिंह और सालम सिंह भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी की कुटिया में आये और कहा कि हे महाराज, हम बहुत विपत्ति मे हैं।न तो हुमारे पास रसद है और ना ही सेना।तब मोहनदासजी ने उन्हें आश्वासन दिया और श्री बालाजी का नाम लेकर दुश्मन की लाल झंडी उडा देने को कहा क्योंकि संकट मिटाने वाले श्री हनुमानजी ही संकट दूर कर सकते हैं और किसी की भी ध्वजा पतन का शोक उसकी पराजय ही होती है।साथ ही उन्होंने निर्देश दिआ कि डाकुओं के गाँव में प्रवेश होने से पहले ऐसा करें तो गाँव का संकट दूर हो जाएगा, डाकू पैरों में आ गिरेंगे और ठीक वैसा ही हुआ।ठाकुर ने दुश्मन की झण्दी उडा दी और वह डाकू उनके चरणों मे गिर पडा।इस घटना के बाद श्री बालाजी के प्रति ठाकुर सालम सिंह की श्रद्धा व भक्ति और बढ़ गयी, इसी के साथ बक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी के प्रति विश्वास भी बढा़।इस तरह से श्री मोहनदासजी ने अपनी वचन सिद्धि नीति एवं कृपा से इस गाँव की अनेकों बार रक्षा की। उन्होंने क​ई बार गाँव के निवासियों को क​ई प्रकार की महामारियों एवं अकालजन्य स्थिति से चमत्करिक ढ़ग से छुटकारा भी दिलाया। 

हनुमत मूर्ति का चमत्कारिक मिलन​ 

उचित समय आया हुअ जानकर भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी ने श्री हनुमानजी का भव्य मंदिर बनवाने का संकल्प किआ और मुर्ती म्ँगवाने के निमित्त ठाकुर सालम सिंह ने अपने श्वसुर चम्पावत सरदार जो आसोटा के निवासी थे, को मूर्ती भेजने का संकेत प्रेषित करवाया। 

जब आसोटे हल के ओटे श्रावण में आन प्रकटे हनुमान ।
निज भक्त जान के विप्र मोहन की भक्ति लखि उर म्यान ॥

सं॰ १८११ (सन्१७५४ ई॰) मे प्रातःकाल सूर्योदय के समय नागौर क्षेत्र के आसोटा निवासी एक जाट को अपने खेत मे हल जोतते समय हल के फ़ाल से कुछ टकराने की आवाज सुनाई पडी़ और उस समय हल रुक गया। तब उसने उस जगह खुदाई कर के देखा तो वहाँ एक मूर्ती थी,उसे निकाल लिया किन्तु प्रमाद के कारण उस मूर्ती की ओर उस जाट किसान ने कोइ ध्यान नहीं दिया। थोडी़ देर के पश्चात उ़स के पेट मे भयंकर पीडा़ की अनुभूती हुई,जिस कारण वह दर्द की पीडा़ से बेहाल होकर एक पेड़ की छाँव में सो गया। मध्यान्ह काल में उस जाट ने अपनी पत्नी से सारी कथा बखान की।जाटनी बुद्धिमती थी।तदुपरांत उस को उस शिला खंड में राम – लक्ष्मण को कन्धे पर लिये हुए भगवान मारुति नंदन की दिव्य झाँकी के दर्शन हुए। अतः उस ने बडी श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक उस प्रतिमा को एक वृक्ष की जड पर स्थापित कर दिया। इस के पश्चात पूरी श्र्द्धा पूर्वक बाजरे के चूरमे का भोग लगाया और ध्यान मे लीन हो गयी।तभी मानो चमत्कार ही हुआ,वह जाट किसान जो उदर पीडा से तडप रहा था,स्वस्थ होकर बैठ गया और कृषि कार्य करने लगा। 

मूर्ति देख खुशी भये ठाकर, निज महलां में धरी मंगाय।
सूते ठ्हकर के स्वप्न में जाय कही, मोहि सालसर तुरन्त पुगाय​॥
अठारा सौ ग्यारोत्तरा, प्रकट भये हनुमान ।
मोहनदास पर कृपा कीन्ही,बणी धोरे पर धाम ॥

इस घटाना की काफ़ी ख्याती फ़ैली। ख्याति को सुनकर आसोटा के ठाकुर उस मूर्ति के दर्शन की लालसा से वहाँ आये,उनके दर्शन कर के उक्त मरुतिनंदन की मूर्ति को अपने महल में ले आये।रात में सोते समय ठाकुरको श्री हनुमान जी ने प्रकट होकर दर्शन दिए और साथ ही आग्या दी कि तुम तत्काल ही इस मूर्ति को सालसर पहुँचा दो । भोर होते ही ठाकुर ने हनुमान जी महाराज की आग्यानुसार अपनी निजी बैलगाडी़ में पाषाण मूर्ति को पधरा कर अपने कुछ निजी कर्मचारियों की सुरक्षा में भजन​-मण्डली के साथ सालसर के लिये विदा किया। 

मारुति नन्दन का मोहनदासजी को स्वप्न मे दर्शन देना 

Photo11उसी रात में भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी को भी श्री मरुति नन्दन के दर्शन प्राप्त हुए।उन्होंने भक्त से कहा कि तुम्हे दिये गये वचन को निभाने के लिए मैं स्वयं काले पत्थर की मुर्ति के रूप मे आ रहा हूँ, जिसे आसोटा के ठकुर ने अपनी सुरक्षा में भेजा है।तुम इस मुर्ति को टीले (धोरे) पर ठकुर सालम सिंह की उपस्थिति में उक्त स्थान पर स्थापित करा देना।स्वप्न में प्रभु की आग्या पाकर श्री मोहनदासजीने प्रात:काल शीघ्र ही नित्य कर्मों से निवृत्त होकर गाँव में जाकर सभी ग्रामवासियों को सूचना दी और उनके साथ कीर्तन करते हुए श्री बजरंगबली की मूर्ति की अगवानी हेतु प्रस्थान किया। सभी ग्रामवासी भगवान हनुमानजी की भक्ति में लीन होकर तन्मयता से कीर्तन गाते – नाचते हुए चल पडे़।आगे जाने पर पावोलाव नामक तालाब के निकट भक्त और भगवान का अविस्मर्णीय मिलन हुआ।इस के उपरांत उंक्त बैलगाडी के पैर स्वयं सालसर की और चल दिए।सालसर पहुँचने पर एक समस्या हुइ कि मूर्ति की स्थापना कहाँ की जाए।तब मोहनदासजी महाराज ने कहा कि धोरे पर चलते-चलते जहाँ भी बैल रुक जायें, वही स्थान श्री बालाजी की इच्छा का स्वीकृत स्थान होगा।कुछ समय बाद चलते-चलते बैल एक स्थान पर रुक गये।उसी स्थान पर बालाजी की मूर्ति की स्थापना की गयी। 

सालासर में बालाजी की मूर्ति स्थापना

Photo12संवत १८११ ( ई॰ सन्१७५४ ) में श्रावण शुक्ला नवमी तिथि को शनिवार के दिन श्री हनुमानजी की की मूर्ति की स्थापना हो ही रही थी कि समीपस्थ जूलियासर के ठाकुर जोरावर सिंह जी आ पहुँचे। उनकी पीठ पर अदीठ बरसों से था, जिसके कष्ट से वे पीडित थे।उन्होंने अपने अदीठ के ठीक होने की मनौती माँगी और दर्शन कर के अपने निवास स्थान पर चले गये।ठाकुर जोरावर सिंह ने डूँग्ँरास गाँव में परम्परा अनुसार स्नान करते समय नाई को आग्या दी कि मेरी पीठ पर अदीठ है इसलिये सावधानी पूर्वक नहलाना।नाई ने पीठ पर देखकर कहा की आपकी पीठ पर तो कोइ घाव नहीं है, केवल एक चिन्ह है। ऐसा देव चमत्कार देखकर ठाकुर साहब अचम्भित रह गये और स्नानादि से निवृत्त होकर बिना भोजन किये ही सालसर आये और यहाँ उपस्थित सभी लोगों से सारा वृत्तांत कह सुनाया। पाँच रुपये भेंट भी चढाये। इसके बाद पूजा सामग्रि म्ँगवाकर श्र्द्धा पूर्वक बालाजी भगवान की पूजा अर्चना की। साथ ही बुँगला (छोटा मंदिर) भी बनवाने की व्यवस्था की और तत्पश्चात वहाँ से रवाना होकर अपने ग्राम वापस आ गये।

जगराता करि सोमहि बारु।आयउ पुनि सुचि मंगल चारु॥
पुलकहि तन मन अति अनुरागा।मोहन मूरति सवारण लागा॥
मंगल मोद उछाह अति झीका। पोता प्रभु कै सेंदुर घेए का॥
कन्धे राम लखन बलकारी।भ​ई अदृश्य रेखाकृति सारी॥
सो अबु सोचि मनहि अनुसारी।भावा सो प्रभु रूप संवारी॥<

प्रथम दरस जेहि रूपहि कीन्हा। मूंछ दाढि़ तस छोलहि दीन्हा॥ 

Photo13संवत १८११ श्रावण शुक्ला द्वादशी मंगलवार को भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी भगवान का ध्यान करते- करते भक्ति-रस में इतना सराबोर हो गये कि भाव-विभोर हो उठे। इसी आनन्दातिरेक स्थिति में उन्होंने घी और सिंदूर का लेपनश्री मारुति नन्दन की प्रतिमा पर कर के उन्हें श्रृंगारित किया। उस समय श्री हनुमानजी के पुर्व दर्शित रूप, जिसमें हनुमानजी श्रीराम- लक्ष्मण को कन्धे पर लिये हुए थे, वह अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर मारुति नन्दन का जो स्वरूप पसंद था, दाढी़-मूँछ​, मस्तक पर तिलक​, विकट भौंहे, सुन्दर आँखें, एक हाथ में पर्वत और एक हाथ में गदा धारण किए हुए का दर्शन होने लगा।

भक्त शिरोमणि मोहनदासजी द्वारा मन्दिर निर्माण 

भक्त मोहनदासजी फ़तेहपुर शेखावटी के मुसलमान कारीगर नूर मोहम्म्द से पूर्व परिचित थे।उन्होंने नूर मोहम्म्द को तत्काल सालसर बुलाया। वह बेचारा मुसलमान कारीगर रोजी रोटी की चिन्ता में परेशान था। इस पर भी फ़क्कड भक्तराज ने उस कारीगर को वहाँ बेगार करने के लिए बुला लिया,इस प्रकार से मन मे विचार करता हुआ वह कारीगर भक्तराज के पास आ पहुँचा।उसके आते ही मोहनदासजी ने उसे एक रुपया देते हुए कहा कि भैया पेहले घर जाओ और घर पर खाने की व्यवस्था करके आओ, फ़िर काम करना । यह देखकर वह चकित रह गया और मोहनदासजी से क्षमा याचना करने लगा कि मैं अपने मन में कुविचार लाया था। 

तदोपरांत संवत १८१५ में सर्वप्रथम नूरा और दाऊ नाम के दो कारीगरों द्वारा मिट्टि एवं पत्थर से श्रीबालाजी के मन्दिर का निर्माण हुआ। 

चमत्कार व ख्याति 

कुछ काल उपरान्त जब सीकर के रावराजा देवीसिंह के पुत्र नहीं हुआ, तब व अपनी जन्म भूमि बलारा गाँव (जो सीकर में ही था) चले, वहाँ से वे एक पुत्र को गोद लेना चाहते थे। मार्ग में ढोलास नाम का एक गाँव पडता है।उसी ग्राम के निकट ही भक्तराज मोहनदासजी के गुरु भाई  गरीबदास जी कुटिया बनाकर रहते थे।वहीं मार्ग में एक विशाल वृक्ष था, जिसकी शाखा से मार्ग अवरुद्ध था। जब मार्ग में जाते समय सीकर नरेश को बाधा पडी़ तो उन्होंने अपने वापस लौटने तक शाखा को कटवा डालने को कहा, किन्तु लौटने पर उन्होंने देख की शाखा उसी प्रकार से मार्ग को अवरुद्ध किये हुए है तो अपने आदेश की अवहेलना पर उन्हे बडा़ क्रोध आया और वह गरीबदास जी को बुरा भला कहने लगा। तभी गरीबदास जी ने कहा की ” ले जा तेरे रागडिये को” । ( हाथी के लिए उक्त शब्द को अपमानजनक रूप मे उपयोग किया जाता है। ) 

बार बार ऐसा कहने पर राजा नीचे झुककर निकलने लगा तो वृक्ष की शाखा अत्यधिक ऊँची उट गयी। ऐसा अद्भुत चमत्कार देख कर देवीसिंह हाथी से उतर पडा़ और प्रणाम करके क्षमा याचना की। गरीबदास जी के क्षमा करने पर उसने पुत्र प्राप्ति की याचना की, तब स्वामि गरीबदास जी ने उसे पुत्र प्राप्ति हेतु भक्तराज मोहनदासजी के पास सालासर जाने का आदेश दिया। 

रावराजा देवीसिंह सीकर आ गये। उसके कुछ दिन बाद ही उनके पोतदार ने डूँगर-जवाहरजी के द्वारा पकडे जाने ऐवम श्री बालाजी की असीम अनुकम्पा से संकट निवारण होने की घटना सुनाई, साथ ही मन्दिर के पूर्ण हो जाने का समाचार भी कहा। 

Photo14राजा देवीसिंह के हिृदय में भगवान बालाजी के दर्शन की अभिलाशा तीव्र​ हुइ और वह जब सालासर पहुँचे तब भक्त मोहनदासजी ने उनकी मनोकामना की पूर्ति के लिए श्रीबालाजी को एक श्रीफ़ल (नारियल) अर्पण करने को कहा और उसी श्रीफ़ल को समीपस्थ जाल वृक्ष में बाँधने की आग्या दी। श्रीमोहनदासजी ने कहा की राजन​, आपके एक सम्बन्धि महोवत सिंह हैं, जो दुजोद ग्राम मे निवास करते हैं, उन्ही की कन्या से आपको एक पुत्र की प्राप्ति होगी, किन्तु देवयोग से वह पुत्र विकलांग होगा, पर उससे आप के कुल की मान प्रतिष्ठा बढेगी। 

भक्तराज की आग्या पाकर रावराजा ने मोहनदासजी से विदा ली और लगभग दुस माह पश्चात उनके यहाँ विकलांग पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम लक्ष्मण सिंह रखा गया । कुमार के मुंडन संस्कार हेतु संवत १८४४ में रावराजा देवीसिंह सपरिवार सालासर आये और मन्दिर के समीप एक महल का निर्माण भी कराया, इसी के साथ ही कुछ भूमि भी प्रदान की। 

उक्त घटना के पश्चात से ही मन्दिर प्रांगण मे स्थित जाल-वृक्ष में श्री फ़ल बाँध कर मनोकामना सिद्ध करने की प्रथा चली आ रही है। वर्तमान समय में उक्त जाल वृक्ष तो नहीं है पर मन्दिर प्रांगण के अन्य वृक्षों में ऐवम मन्दिर में मनोकामनार्थ नारियल बाँधे जाते हैं। नारियलों की बढती जा रही सन्ख्या उक्त स्थान की सिद्धि का बखान कर रही है। 

भक्त मोहनदास : समाधि 

Photo15कालांतर से लगातार एकांतवास करते हुए साधना में ही रत रहने की प्रबल अभिलाषा के कारण भक्त मोहनदासजी ने अपने भानजे उदयरामजी को प्रथम पुजारी के रूप मे नियुक्ति की। कुछ समय बाद मोहनदासजी ने भूलोक में अपने कर्तव्यों की इति श्री मानते हुए जीवित अवस्था में समाधि लेने कि ठान ली। इस अवसर पर समस्थ स्थानीय निवासियों, अनेकों साधु संतों सहित गुरुभाइयों साथ श्री बालाजी भी पधार गये। 

समाधि ग्रहण करने से पूर्व भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी ने अप्ने इष्टदेव श्री हनुमानजि से प्रार्थना की – हे सखा ! मैं आपसे हाथ जोडकर प्रार्थना करता हूँ कि मेरी बहन के लाडले उदयराम को गृहस्थ रहते हुए मन्दिर में पूजन कार्य करते रहने अवं दीर्घायु होने का शुभ आशीर्वाद प्रदान करें। 

तत्पश्चात संवत १८५० की वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को प्रातःकाल शुभ बेला में भक्त शिरोमणि श्री मोहनदासजी जीवित समाधिस्थ हो गये। समाधि ग्रहण के समय मंद गति से जल कि फ़ुहारों के साथ पुष्पों की वर्षा होने लगी थी। मानो मारुतिनंदन श्री हनुमानजी का आशीष उनके शीश पर समाहित हो रहा हो। दसों दिशा स्तब्ध से रह गये थे, इसि के साथ स्वर्गवासी बहन कान्ही बाई का आशीष भी अनुज को मिल रहा था। 

मोहनदासजी की समाधि व मोहनचौक का निर्माण 

प॰ उदयरामजी पूजारी अपने पूज्य मामाजी को अंजुलि भरकर पुष्पों की वर्षा हेतु पुष्पार्पण कर रहे थे। उपस्थित जन समुदाय के सौभाग्य का तो कहना ही क्या, जिन्होनें इस दिव्य आलौकिक दृश्य का रसापन किया। ऐसे कलिकाल में उक्त अलौकिक घटना का होना एवं भक्त शिरोमणि पवन पुत्र हनुमानजी के सखा तुल्य अर्पित भक्त मोहनदासजी महाराज जैसी शख्सियत का होना स्वयं में एक दैवीय घटना है। 

संवत १८५२ में ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी दिन शनिवार की शुभ बेला मे प॰ उदयरामजी द्वारा सर्वप्रथम उक्त छतरियों का निर्माण कार्य कराया गया। मोहन मन्दिर के प्रवेश द्वार पर एक प्राचीन प्रस्तर स्थम्भ (कीर्ति स्मारक) स्थित है, जिसके उपर कुछ पंक्तियाँ प्राचीन लिपि मे अंकीर्ण हैं। 

इसी मोहन मन्दिर में प्रतिदिवस प्रात्: कालीन एवं संध्या बेला में आरती होती है तथा प्रसाद का वितरण होता है। प्रति वर्ष अश्विन मास में कृष्णा त्रयोदशी को भक्तप्रवर श्री मोहनदासजी महाराज के श्राद्ध को बडी धूमधाम से सम्पन्न किया जाता है। इस श्राद्ध के प्रसाद की बडी महत्ता है। 

श्री बालाजी मन्दिर के दक्षिण द्वार पर भक्तप्रवर श्री मोहनदासजी  की तपस्या का स्थान है। इस्को धूणा कहते हैं। यहाँ पर उसी समय से अखण्ड अग्नि की धूनि जल रही है। इस्की विभूति (भस्म) का बडा महत्व माना जाता है। 

सालासर बालाजी के मन्दिर में होने वाली प्रर्थनाएं 

आज भी पन्डित उदयरामजी के दोनों पुत्रों (ज्येष्ठ पुत्र- ईसरदासजी, अनुज पुत्र-कान्हीरामजी) के परिवार वाले मन्दिर की व्यवस्था का कार्य सम्भालते हैं। 

प्रातःकाल ४ बजे पुजारीगण उठकर ङारा बजाते हैं, जिससे आने वाले श्रद्धालु भी नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान आदि करके मन्दिर की सेव और पूजा कार्य में लग जायें। सबसे पहले कुएँ का जल लेकर गृह में प्रक्षालन करते हैं, फ़िर पूजा के सभी पत्रों को साफ़ किया जाता है, फ़िर जल, दूध, दही, घी शक्कर शहद, तुलसी दल​, फ़ूल और नैवेद्य आदि एकत्रित कर के अखंड ज्योति मे घी डालते हैं। सूर्य उदय होने से पेहले ही श्री बालाजी महाराज को मंगला भोग से प्रसन्न किया जाता है। 

मंगला भोग करने के बाद मंगला आरती की जाति है जबकि सन्ध्या में बाल भोग से पहले सन्ध्या आर्ति की जाति है। जब भी मौसम बदलता है उसके अनुसार समय भी बदल दिया जाता है। जैसे सर्दी के समय शयन आरति रात्रि नौ बजे होती है तथा गर्मी के समय रात्रि १० बजे का समय निश्चित है। जब भी प्रात:काल व सन्ध्याकाल की आरतियाँ होति है, अपार जन समूह मन्दिर के जयकारों से स्थान की गरिमा को बढा देता है। सभी नाच नाच कर आत्म विभोर हो जाते हैं । शंखनाद किया जाता है और जयघोश भी होति है। आरति के बाद भगवान की परिक्रमा करते हैं, तब पन्डित समूह स्तुति पाठ करता है। 

दोपहर में बडे पुजारी जी रसोइ घर से जल का पात्र लेकर निकलते हैं तथा जल छिडकते हुए  गृह तक आते हैं। अन्य पूजारिगण लाल रंग के वस्त्र पहन कर बडे थाल में नैवेद्य लेकर चलते हैं। इस दौरान परिक्रमा व घण्टा ध्वनि आदि नहीं की जाती । फ़िर श्री विग्रह के पास में चौकी पर नैवेद्य रखते हैं और सामने परदा लगा दिया जाता है। जितने भी भक्त वहाँ पर उपशिथ होते हैं सभी वैदिक राजभोग गाते हैं। फ़िर राजभोग वहीं पर उपस्थित भक्तों में वित्रित कर दिया जाता है तथा पुजरियों द्वारा जो जल मार्ग में छिडका गया है, भक्तजन श्रद्धा पूर्वक उसे चरणामृत के रूप में हाथों में लेकर उससे आचमन करते हैं, अपनी आँखों से लगाते हैं, हृदय पर लगाते हैं जिससे रोग का निवारण होता है। 

जब राज भोग लगता है उसमें अधिकतर खीर चूरमा लड्डू पेडा आदि ही मीठे भोग के रूप में लगाये जाते हैं। मंगलवार वाले शुभ दिन को मोठ बाजरे की खिचडी़ की भोग परम्परा सदियों से निभाई जाति है। मन्दिर के पवित्र कुएँ के जल से बनी दाल का स्वाद अद्भुत होता है। यहाँ का जल पाचन शक्ति में उपयोगी सिद्ध होता है और रोग निवारक माना गया है। 

जब सायंकाल होता है तो पन्डित गण सामूहिक रूप से स्तुति पाठ करते हैं। बाल भोग ग्रहण करते ही भक्त गण शयन आरती के दौरान माला से जाप करते हुए आनंद का अनुभव करते हैं। बडी मनकों की माला मन्दिर के और से जाप के लिए भी दी जाती है। ये लम्बी लम्बी मालायें चार पाँच भक्त चारों और बैठकर भी कर सकते हैं। इसके साथ साथ हनुमान चालीसा, सुंदर काण्ड, संकटमोचन हनुमानाष्टक, बजरंग बाण, हनुमान साठिका,  हनुमान बाहुक, हनुमत कवच स्तोत्र आदि का पाठ धूम धाम से किया जाता है। 

माँ काली के लाडले, पवन पुत्र हनुमान
रामदास रघुवर प्रिय, देव करें सम्मान
बालाजी बाल रूप में, करते बडे बडे काम
मेहंदीपुर – सालासर में करता तुम्हें प्रणाम ।